कश्मीर : बन्दूक से जमीन जीत सकते हैं, लोगों के दिल नहीं

Mata Kasturba 150th Jayanti Sammelan
March 26, 2019

कश्मीर : बन्दूक से जमीन जीत सकते हैं, लोगों के दिल नहीं

पत्रांक : 150/2019-20                                                        दिनांक : 20 अगस्त 2019

 

 सादर प्रकाशनार्थ 

कश्मीर : बन्दूक से जमीन जीत सकते हैं, लोगों के दिल नहीं

महादेव विद्रोही 

सेवाग्राम : जम्मू एवं कश्मीर को स्वायत्तता प्रदान करने के लिए बनाये गये संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 370 एवं संपत्ति, विशेषकर जमीन के हस्तांतरण के संदर्भ में स्थानीय आबादी को संरक्षण प्रदान करने के लिए बनाये गये प्रावधान 35ए की समाप्ति ने संविधान की बुनियादी संरचना पर आघात किया है। केन्द्र सरकार के इस एकतरफा, मनमाना एवं अलोकतांत्रिक कदम से देश के अन्य प्रांतों एवं क्षेत्रों को हासिल विशेष संरक्षण के सामने संकट खड़ा हो गया है। सर्व सेवा संघ सरकार के इस कदम से चिन्तित है और इसे वापस लेने/रद्द करने की मांग करता है।

आतंकवादी हमले का बहाना बनाकर पहले तीर्थयात्रियों को कश्मीर से बाहर किया गया। फिर पूरे जम्मू कश्मीर को एक छावनी में तब्दील कर वहां कफ्र्यू लगा दिया गया है,  संचार के सारे माध्यम टेलीफोन, मोबाइल, ब्रॉडबैंड, टीवी आदि बंद कर दिये गये हैं। घाटी के सभी विरोधी राजनीतिक दलों के नेताओं को गिरफ्तार या नजरबंद कर दिया गया है। जो लोग बीमार हैं, उनकी क्या हालत होगी, यह कहना अभी मुश्किल हो गया है। क्योंकि  कर्फु के कारण न तो वे घर से निकल पा रहे हैं और न ही अस्वस्थता की जानकारी किसी और को दे पा रहे हैं। जो मजदूर हैं उनकी स्थिति सबसे खराब है। क्योंकि वे रोज कमाने खाने वाले लोग हैं।

सर्व सेवा संघ (अ.भा.सर्वोदय मंडल) के अध्यक्ष श्री महादेव विद्रोही  ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा है कि केन्द्र सरकार को नहीं भूलना चाहिए कि भारत राज्यों का संघ है। भारत के संविधान ने राज्यों एवं संघ के लिए अलग-अलग रेखाएं खींची हैं। उस रेखा को मिटाना अलोकतांत्रिक और आपराधिक है।

जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख को केन्द्रशासित प्रदेश घोषित करते हुए कहा गया कि वहां बहुत भ्रष्टाचार था। क्या भ्रष्टाचार का इलाज केन्द्रीय शासन है? अभी-अभी केन्द्रीय सचिवालय से कई वरिष्ठ अधिकारियों को भ्रष्टाचार के आरोप में निकाला गया है। यही नौकरशाह जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में जाकर राजा हरिश्चन्द्र बन जायेंगे?

भारत के अनेक सीमावर्ती राज्यों और कश्मीर के पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में भी यह प्रावधान है कि बाहर के लोग वहां जमीन नहीं खरीद सकते हैं। तो क्या केन्द्र सरकार हिमाचल प्रदेश सहित पूर्वोत्तर के अधिकांश राज्यों को केन्द्र शासित राज्य बनायेगी? इसी तरह गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पंजाब आदि राज्यों में भी प्रावधान है कि कृषि योग्य भूमि केवल किसान ही खरीद सकता है। खेती की जमीन का उपयोग दूसरे कार्यों के लिए न हो, इस आशय से यह कानून बनाया गया होगा। क्या केन्द्र सरकार इसे बदल देगी? आदिवासियों की जमीन इसलिए बची हुई है क्योंकि उसे गैर आदिवासियों को बेचने पर प्रतिबंध है। यह आदिवासियों के लिए एक बहुत बड़ा रक्षा कवच है। इसके साथ किसी को खिलवाड़ करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है।

अभी जम्मू-कश्मीर के संबंध में केन्द्रीय शासक पार्टी के लोग जिस तरह की प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर रहे हैं वह शर्मनाक एवं निन्दनीय है। उदाहरण के लिए भाजपा के खतौली के विधायक का कश्मीर की गोरी लड़कियों से शादी करने का रास्ता आसान हो जाने संबंधी बयान इसी की एक कड़ी है। इस तरह के बयान सामाजिक शालीनता का उल्लंघन करते हैं, अशिष्टता दिखाते हैं और पूरी कश्मीरियत का अपमान करते हैं।

केशवानंद भारती के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्देश द्रष्टव्य है कि राज्यों के मामले में संघ संविधान की सीमाओं का उल्लंघन हरगिज नहीं करेगा। कश्मीर के बारे में कोई भी निर्णय वहां की जनता को विश्वास में लेकर ही किया जाना चाहिए। बन्दूक से केवल वहां की वादियों और जमीन पर तो कब्जा कर सकते हैं, उसे पूंजीपतियों के हवाले भी कर सकते हैं पर जनता का दिल नहीं जीत सकते। सरकार को याद रखना चाहिए कि देश जमीन से नहीं, लोगों से बनता है।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण एवं आचार्य विनोबा भावे ने कश्मीर के संबंध में जो विचार व्यक्त किये थे, वे आज ज्यादा सामयिक हो गये हैं। अपनी कश्मीर यात्रा पर लिखी आचार्य विनोबा की पुस्तक मुहब्बत का पैगामसभी को पढ़नी चाहिए। हम मानते हैं कि बिना कोई जोड़-तोड़ किये उनके शब्दों का ज्यों का त्यों पालन किया जाना चाहिए।

जयप्रकाश नारायण ने राज्यों की स्वायत्तता एवं भारतीय गणराज्य के संघीय ढांचे को शक्तिशाली बनाने के लिए प्रांतों को विदेश, सैन्य, संचार व वित्त को छोड़कर सारे अधिकार सौंप देने की वकालत की थी। संविधान के अनुच्छेद 370 में यह प्रावधान शामिल है। इसके अलावा भारत सरकार द्वारा बनाये गये किसी भी कानून को लागू करने के लिए जम्मू व कश्मीर की विधानसभा की सहमति आवश्यक मानी गयी है। अनुच्छेद 370 की तरह देश के पूर्वोत्तर में भी व्यवस्था की गयी है। ज्ञात हो कि जम्मू व कश्मीर में जाने के लिए किसी प्रकार की अनुमति की जरूरत नहीं होती है पर उत्तर पूर्व के कई राज्यों में प्रवेश से पहले परमिट लेना पड़ता है। यहां भी कोई बाहर का व्यक्ति जमीन नहीं खरीद सकता है। अनुसूची 6  के अनुसार पूर्वोत्तर को यह विशेष दर्जा प्राप्त है। इसी प्रकार के गणराज्य के आदिवासी बहुल 9 राज्यों में संविधान की 5वीं अनुसूची लागू है। इसमें भी आदिवासी जनता व क्षेत्र को विशेष अधिकार सौंपे गये हैं। आदिवासियों की जमीन गैर आदिवासी द्वारा खरीदने पर रोक है। इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश में भी कोई गैर निवासी जमीन नहीं खरीद सकता है। इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश में भी कृषि जमीन को गैर कृषक नहीं खरीद सकते। भारत की सांस्कृतिक विविधता व स्थानीय आबादी की आकांक्षाओं व स्थिति के अनुसार उपरोक्त प्रावधान किये गये थे, जिसे नष्ट करने की शुरुआत हो चुकी है। सभी सचेत नागरिकों की मुखर आवाज ही सरकार के इस कदम को रोक सकती है।                    

सरकार यह दावा कर रही है कि यह कदम जम्मू एवं कश्मीर के विकास के लिए उठाया जा रहा है। हम सभी जानते हैं कि बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश व बिहार के नौजवान यहां कार्यरत हैं। सरकार को इतनी ही विकास की ललक है तो फिर उत्तर प्रदेश व बिहार का विकास क्यों नहीं करती? अगर विकास करने के लिए राज्यों को टुकड़ों में बांटना जरूरी है तो क्या उत्तर प्रदेश और बिहार आदि के भी टुकड़े किये जायेंगे?

वास्तव में जम्मू एवं कश्मीर पूर्वोत्तर व आदिवासी बाहुल्य इलाकों पर कॉरपोरेट की गिद्ध दृष्टि है और उन्हीं के मंसूबों को साकार करने के लिए अनुच्छेद 370 एवं 35ए को समाप्त कर राज्य का विभाजन और केन्द्र शासित राज्य की व्यवस्था करने की कोशिश है। केन्द्र सरकार की पूरी कोशिश कॉरपोरेट परस्त, एकतरफा, एकतांत्रिक राज्य की स्थापना करने की है।         

 

मारोती गावंडे

कार्यालय मंत्री